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विचार: समाज को दुर्बल करने वाले नियम-कानून

DARSH NEWS डेस्क • 05 Nov 2026, 11:22 PM IST
विचार: समाज को दुर्बल करने वाले नियम-कानून

यह विचित्र दृश्य है कि जब स्वतंत्र भारत के सामाजिक व्यवहार में जातिगत ऊंच-नीच और छुआ-छूत लगभग खत्म होने को हैं, तब नए सिरे से विविध प्रकार की जातिवादी नीतियां बनाई जाती हैं। सरकार यूजीसी के असंतुलित नियमों की समीक्षा पर विचार कर रही है। शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव, अविश्वास बढ़ने की आशंका थी।

सुप्रीम कोर्ट ने विवादित यूजीसी नियमों पर पहले ही रोक लगाई। शंकर शरण। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक प्रमुख पदाधिकारी सुनील आंबेकर ने कुछ ही दिन पहले कहा था कि यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए नियम असंतुलित हैं।

अब सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कहा कि यूजीसी नियमों को लेकर छात्रों की चिंताओं और आपत्तियों पर नए सिरे से विचार किया जा रहा है और वह इन नियमों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने पर भी विचार कर रही है, ताकि किसी भी वर्ग के छात्रों में असंतोष या भेदभाव की आशंका न रहे।

इसी वर्ष के प्रारंभ में अधिसूचित किए गए यूजीसी के नए नियमों शिक्षण संस्थानों में एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्र, कर्मचारी, शिक्षक आदि की हर शिकायत पर कार्रवाई होगी, जबकि अन्य जातियों के लोगों को यह सुविधा नहीं मिलेगी। इनमें परोक्ष मान्यता थी कि कुछ जातियों के लोग विश्वसनीय हैं, जबकि अन्य अविश्वसनीय।

आखिर शिकायत सुनने में भेदभाव क्यों करना? ऐसे नियमों पर तो डा. आंबेडकर को भी हैरत होती, क्योंकि इनमें कोई न्याय नहीं, बल्कि भेदभाव झलकता था।

आधिकारिक रूप से किसी संपूर्ण जाति समूह को स्थायी रूप से दोषी, निर्दोष या विश्वसनीय, अविश्वसनीय मान लेना धक्का पहुंचाने वाली बात है। इससे बिना वजह दो समूहों में दुराव होता है। जब किसी विश्वविद्यालय के किसी छात्र समूह ने ऐसी मांग नहीं की थी कि उसकी शिकायत पर कार्रवाई हो, जबकि दूसरे की शिकायत की उपेक्षा की जाए, तब यूजीसी के नए नियम अकारण किसी समूह के प्रति दूसरे में अनुपयुक्त भाव ही पैदा करते।

कौन विवेकशील इसे उचित मानता? ऐसा कुछ संविधान निर्माताओं की कल्पना में नहीं था। तभी सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाई।

सरकार को पहले ही इस सच पर ध्यान देना चाहिए था कि ऐसे नियमों से शिक्षा संस्थानों में अस्वस्थ भाव, आपसी भय और संदेह बढ़ता। बहुत से लोग ऐसे कदमों को राजनीति प्रेरित मानते हैं। इसीलिए सभी दल इस पर एक तरह की चुप्पी या उदासीनता रखते हैं, किंतु यह वृहद हिंदू समाज के लिए अहितकर है।

उसके अंदर ही विविध नेता सामाजिक न्याय के नाम पर अन्याय का दायरा बढ़ाते रहते हैं। इससे हिंदू एकता कैसे बनेगी? जब हिंदू ही एक नहीं होंगे तो देश के लिए भी इसके तात्कालिक और दूरगामी असर होंगे।

समस्या यह है कि सभी दल इस व्यापक पहलू की उपेक्षा करते हैं। यूजीसी के नए नियम तमाम शैक्षिक संस्थानों में छात्रों, शिक्षकों, कर्मियों को आपसी संदेह, डर और आक्रोश में उलझाने वाले थे। ये नियम शिक्षा संस्थानों के परिवेश को असहज ही बनाते।

यदि नए नियम लागू हो जाते तो वे उन छात्रों के प्रति भी अन्याय का कारण बनते, जिनके हित का दावा करते हुए यूजीसी ने उन्हें बनाया था। इससे विशेष जातियों के शिक्षक या प्रशासक छात्रों या अधीनस्थ कर्मचारी को उसकी गलती के लिए कुछ कहने में भी डरते। उन्हें यह डर होता कि किसी भी बात पर यदि जातिगत उत्पीड़न की शिकायत हो गई तो नाहक फंसेंगे।

दूरगामी दृष्टि से देखा जाए तो यूजीसी के नए नियम एक दुष्चक्र थे। ऐसे दुष्चक्र तोड़ने के बदले सभी दल उन्हें समर्थन देकर फायदे की प्रतियोगिता करते प्रतीत होते हैं। इसी से जातिवादी राजनीति फलती-फूलती है।

यूजीसी के नए नियम इसलिए भी अनावश्यक थे, क्योंकि 'अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार) कानून' के रूप में पहले से ही एक कड़ी व्यवस्था मौजूद है। उसके प्रविधान इतने कठोर हैं कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में उसमें कुछ राहत दी थी, ताकि झूठी शिकायतों पर किसी को दंडित न होना पड़े।

हालांकि संसद ने संविधान-संशोधन कर उस फैसले को निरस्त कर दिया। फलत: इस कानून का दुरुपयोग बढ़ गया। आए-दिन शातिर या बदले की भावना से भरे लोग सामान्य और ओबीसी वर्ग के किसी व्यक्ति पर प्रताड़ना का आरोप लगाकर ब्लैकमेल करते रहते हैं।

इसलिए ऐसे सभी एकतरफा कानूनों में सुधार की जरूरत है। इन्हें सामाजिक न्याय का नाम देना न्याय को विद्रूप करना है। न्याय का स्थापित दर्शन यह है कि न्याय न केवल हो, बल्कि होता हुआ भी दिखे।

जातिगत आधार पर नई-नई सुविधाओं या वंचनाओं में इस दर्शन की उपेक्षा हो रही है। एकतरफा नियम-कानून संविधान में उल्लिखित समानता के सिद्धांत और सामान्य मानवीय नैतिकता के भी प्रतिकूल हैं। कोई न्याय-दर्शन नहीं कहता कि किसी व्यक्ति को किसी समूह विशेष का होने मात्र से पहले से दोषी और संदिग्ध मान लिया जाए या किसी व्यक्ति को किसी अन्य समूह विशेष का होने मात्र से निर्दोष और सच्चा माना जाए।

एक ऐसे समय असंतुलित नियम-कानून बनाना और भी अनुपयुक्त है, जब सामाजिक स्थितियां बुनियादी रूप से बदल चुकी हैं और सभी जातियों के लोग सभी तरह के काम करते पाए जाते हैं। यह एक विडंबना ही है कि जब किसी असंतुलित सामाजिक कानूनों में न्यायपालिका कुछ सुधार भी करती है तो संविधान संशोधन कर उसे पलट दिया जाता है।

अब तक कम से कम सात बार यह काम हो चुका है। यह भी उल्लेखनीय है कि यूजीसी ने शिक्षा और शिक्षकों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कोई नियम या विधि नहीं बनाई है। न संसद में इस पर कोई विधेयक आया है।

न सभी छात्रों को अपनी-अपनी भाषा में भी उसी स्तर की अच्छी शिक्षा मिल सकने के लिए कभी कुछ ठोस सोचा गया है, जो अंग्रेजी में उपलब्ध है। उलटे देसी भाषाओं के साहित्य और प्रकाशनों की मात्रा, विविधता और गुणवत्ता लगातार घट रही है। जबकि भाषा शिक्षा की नींव ही नहीं, पूरी संस्कृति का आवास है।

यह दिखाता है कि शिक्षा में ‘भेदभाव खत्म करना’ या ‘समान अवसर’ बनाना यूजीसी या नीतिकारों की प्राथमिकता में क्या स्थान रखता है? यह विचित्र दृश्य है कि जब स्वतंत्र भारत के सामाजिक व्यवहार में जातिगत ऊंच-नीच और छुआ-छूत लगभग खत्म होने को हैं, तब नए सिरे से विविध प्रकार की जातिवादी नीतियां बनाई जाती हैं।

इससे किन्हीं दलों को जो भी लाभ या हानि हो, समाज तो दुर्बल होता है। संपूर्ण समाज को हानि पहुंचा कर उसका कोई भाग सबल नहीं होता, बल्कि पूरा समाज दुर्बल होता है। (लेखक राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं) संपादकीय आलेखnazariyaThu, 05 Nov 2026 11:12 PM (IST)जागरण संपादकीय: खीझ निकालती कांग्रेस।

समाचार स्रोत: DARSH NEWS

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