ट्रंप प्रशासन के पास विदेश मामलों पर तो निर्णय के विशेषाधिकार कायम रहेंगे, लेकिन संसदीय गतिरोध से उनका प्रभाव अवश्य फीका पड़ेगा ट्रंप को मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी से जोरदार झटका लगा। घरेलू एजेंडा कमजोर, विदेश नीति में नई रणनीतिक गुंजाइश तलाशेंगे ट्रंप।
भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ेगा गहरा असर, नई दिल्ली को तालमेल। हर्ष वी. पंत।
अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को जोरदार झटका लगा। उनकी प्रतिद्वंद्वी डेमोक्रेटिक पार्टी अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के दोनों सदनों-प्रतिनिधि सभा एवं सीनेट में बहुमत के पड़ाव पर पहुंच गई है। चुनाव परिणाम ट्रंप प्रशासन को पारंपरिक आईना दिखाने से अधिक कड़ी फटकार लगाने जैसे हैं।
इन नतीजों की गूंज कहीं गहरे संदेश समाहित किए हुए है। ट्रंप की मनमानी टैरिफ नीतियों से बढ़ी महंगाई से जीवन-यापन की लागत में बढ़ोतरी से आम अमेरिकी त्रस्त हो गए थे। ईरान के साथ युद्ध भी घरेलू बेचैनी को बढ़ाने वाला साबित हुआ।
मध्यावधि चुनाव में लगे झटके के बाद ट्रंप को अपने शेष कार्यकाल के लिए नए सिरे से रणनीति तैयार करनी होगी, क्योंकि अब उनकी राजनीतिक चुनौतियों का बढ़ना तय है। अमेरिकी संसद पर डेमोक्रेट का नियंत्रण ट्रंप के घरेलू एजेंडे की डोर को कमजोर करेगा। इससे कराधान, सरकारी खर्च की अनुमति पर तकरार से लेकर विधायी कदमों पर टकराव बढ़ने के आसार बनेंगे।
हालांकि ट्रंप के पास टैरिफ, स्वास्थ्य सेवा और आव्रजन संबंधी अपनी नीतियों के मामले में कार्यकारी अधिकारों एवं वीटो की शक्ति होगी, लेकिन संस्थागत द्वंद्व बढ़ने की स्थिति में राष्ट्रपति को किसी ठोस विधायी व्यवस्था के बजाय अस्थायी वित्तीय प्रविधानों से ही काम चलाना पड़ेगा।
ट्रंप प्रशासन के लिए संसदीय कसौटियां भी सख्त होंगी, जिसमें कार्यकारी शक्तियों के दुरुपयोग, नैतिक सरोकारों और विदेशी व्यावसायिक हितों पर बारीक नजर रखी जाएगी, जबकि सीनेट में डेमोक्रेटिक बहुमत न्यायिक और कैबिनेट स्तर की नियुक्तियों की राह और जटिल बनाएगा। अपने शेष कार्यकाल में ट्रंप को अपनी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के बजाय अपने तमाम फैसलों के बचाव में ही अपनी अधिकांश राजनीतिक पूंजी झोंकनी होगी।
इतिहास साक्षी है कि जब भी अमेरिकी राष्ट्रपतियों को घरेलू मोर्चे पर विधायी विरोध के चलते कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ा तो उन्होंने विदेश नीति में अधिक रणनीतिक गुंजाइश तलाशने की कोशिश की है, क्योंकि इस मोर्चे पर उनकी कार्यकारी शक्तियां कहीं व्यापक होती हैं। ट्रंप भी इसी राह पर बढ़ सकते हैं, लेकिन ईरान से संघर्ष और पश्चिम एशिया की अस्थिरता उनकी विदेश नीति को भी मुकाबले का एक नया अखाड़ा बना सकती है।
संसद पर डेमोक्रेटिक नियंत्रण के चलते सैन्य अभियानों, उनके वित्तीय बोझ और सामरिक उद्देश्यों की कहीं अधिक सख्त निगरानी के आसार बढ़ेंगे। इसके अलावा मुद्रास्फीति की चिंताओं के बीच टैरिफ से जुड़ी शक्तियों के एकतरफा इस्तेमाल पर भी ट्रंप प्रशासन को कड़ी चुनौती मिलेगी।
अमेरिका के सहयोगियों से लेकर प्रतिद्वंद्वियों तक के लिए मध्यावधि चुनावों के परिणाम मायने रखते हैं। बदले राजनीतिक परिदृश्य में अमेरिकी नीति-निर्माण में अस्थिरता गहराने का अंदेशा है। कार्यकारी शक्ति के रूप में ट्रंप प्रशासन के पास विदेश मामलों पर निर्णय के विशेषाधिकार तो कायम रहेंगे, लेकिन संसदीय गतिरोध से उनका प्रभाव अवश्य प्रभावित होगा।
अमेरिका के विरोधी देश इसका लाभ उठाने की गुंजाइश तलाशेंगे। खास तौर से वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए यह स्थिति और संवेदनशील होगी, जहां ईरान संघर्ष, प्रतिबंधों की नीति और सैन्य भागीदारी पर संसद की कड़ी निगरानी का मिलाजुला असर कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता बढ़ा सकता है, जिसका व्यापक प्रभाव वैश्विक मुद्रास्फीति पर पड़ेगा।
यूरोपीय सहयोगियों के साथ ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र के सहयोगी देशों के लिए डेमोक्रेट्स की बढ़ी शक्ति संवाद का एक वैकल्पिक माध्यम और अमेरिकी सुरक्षा में एकतरफा कटौती के सापेक्ष कुछ हद तक भरोसा प्रदान कर सकती है, फिर भी अपने सुरक्षा दायित्वों का बोझ सहयोगी देशों को मुख्य रूप से स्वयं ही उठाना पड़ेगा।
भारत के लिए भी अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के नतीजे गहरे अर्थ लिए हुए हैं। भले ही दोनों देशों की व्यापक रणनीतिक साझेदारी एक बड़ी हद तक हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग पर टिकी हो, लेकिन वाशिंगटन में बदले राजनीतिक समीकरण विशेष नीतिगत क्षेत्रों में नए अवसर बना सकते हैं।
इसी के साथ जहां डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत व्यापार ओं की राह को और जटिल बना सकती है, वहीं घरेलू राजनीतिक आलोचनाओं से निपटने के उद्देश्य से ट्रंप ठोस आर्थिक परिणाम दिखाने के लिए व्यापार समझौते को तेजी से आगे बढ़ाने का प्रयास कर सकते हैं। एकतरफा टैरिफ को लेकर संसद की निगरानी भी नई दिल्ली के लिए सौदेबाजी की ताकत बढ़ाएगी, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में, जहां अमेरिकी बाजार तक पहुंच व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
इसके बाद भी यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि संसद पर डेमोक्रेटिक नियंत्रण से अमेरिकी व्यापार नीतियां स्वाभाविक रूप से भारत के प्रति लचीली हो जाएंगी। वर्तमान में बाजार तक पहुंच, घरेलू उद्योग संरक्षण और व्यापार असंतुलन से जुड़े मुद्दे केवल रिपब्लिकन पार्टी तक सीमित नहीं रह गए हैं।
आव्रजन भी एक ऐसा क्षेत्र है, जहां संसद में बदला हुआ शक्ति-संतुलन भारत के लिए काफी मायने रख सकता है। रूसी कच्चे तेल की निरंतर खरीद का मुद्दा भी द्विपक्षीय संबंधों में तनाव और मतभेद का एक पहलू बना रहेगा। मध्यावधि चुनावों ने ट्रंप के शेष कार्यकाल में राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ाने का काम किया है।
विधायी प्रतिरोध उनके घरेलू एजेंडे को सीमित करने के साथ विदेश नीति से जुड़े उनके लक्ष्यों की पूर्ति को जटिल बना सकते हैं। यह जनादेश हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर अमेरिकी विदेश नीति पर दोनों दलों के नजरिये की बुनियाद को बदले बिना ट्रंप की अतिशय महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगा सकता है।
बदले हालात में नई दिल्ली को व्हाइट हाउस के साथ-साथ नए सिरे से आकार लेने वाली अमेरिकी संसद, दोनों के साथ प्रभावी तालमेल बिठाना पड़ेगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी वाशिंगटन की घरेलू राजनीतिक उथल-पुथल के असर से अप्रभावित रहे। (लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हैं) संपादकीय आलेखapnibaatWed, 04 Nov 2026 11:44 PM (IST)विचार: खुद को कमजोर करने वाली राजनीति।
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