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विचार: लोकतंत्र के नाम पर अलोकतांत्रिक आचरण

DARSH NEWS डेस्क • 02 Nov 2026, 09:30 PM IST
विचार: लोकतंत्र के नाम पर अलोकतांत्रिक आचरण

मतदाता सूची पुनरीक्षण बहाने 'रिजीम चेंज' की मांग लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। तख्तापलट का यह एजेंडा देश में अराजकता व अस्थिरता ला सकता है। विपक्ष का अभियान 'रिजीम चेंज' की खतरनाक संकल्पना से जुड़ा है।

विदेशी हस्तक्षेप, जॉर्ज सोरोस जैसे तत्वों की भूमिका पर प्रकाश डाला। यह भारतीय लोकतंत्र और संविधान के लिए गंभीर खतरा बताया गया। प्रो.

निरंजन कुमार। चुनाव की पवित्रता सुनिश्चित करने के लिए मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने मुहिम छेड़ रखी है। इसमें काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी जैसे समूह भी सक्रिय हैं।

इस अभियान का एक खतरनाक सच तब सामने आया, जब विपक्ष के समर्थकों में से एक प्रशांत भूषण ने सार्वजनिक रूप से कहा कि 'हां, हम देश में रिजीम चेंज चाहते हैं। ' विवाद बढ़ने पर विपक्षी दलों ने लीपापोती का काम किया, लेकिन इससे बात बनती हुई नहीं दिखी। रिजीम चेंज कोई सामान्य संकल्पना नहीं है।

इसका वास्तविक अर्थ है तख्तापलट यानी एक निर्वाचित सरकार या स्थापित राजनीतिक व्यवस्था को हटाकर एक नई और भिन्न व्यवस्था का प्रवर्तन करना। यह कवायद अक्सर बलपूर्वक, दबाव या बाहरी हस्तक्षेप से होती है, न कि सामान्य चुनावी प्रक्रिया से। इस शब्दावली का इस्तेमाल विदेशी सैन्य कार्रवाई, गुप्त अभियान, प्रतिबंधित या विपक्षी समूहों को समर्थन देकर झटके से सरकार बदलने के संदर्भ में होता है, न कि लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया के लिए।

रिजीम चेंज का परिणाम होता है-अराजकता, शक्ति शून्यता, गृहयुद्ध या लंबे समय की अस्थिरता। जब अमेरिका महाशक्ति के रूप में उभरा तो रिजीम चेंज की संकल्पना उसकी विदेश नीति का एक अहम हिस्सा बन गई। अमेरिका का इतिहास अमेरिकी हितों के प्रतिकूल काम करने वाली सरकारों या स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय नीति रखने वाले देशों में तख्तापलट कराने के उदाहरणों से भरा हुआ है।

आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस नीति को एक खतरनाक हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। जो देश विकास की राह पर अग्रसर है, जिनकी सरकारें तथाकथित स्वघोषित वैश्विक ताकतों की जी-हुजूरी न कर स्वतंत्र निर्णय करती हैं, वहां विदेशी ताकतें रिजीम चेंज का सहारा लेती हैं, ताकि ऐसे लोगों को सत्ता में ला सकें, जो भविष्य में उनकी कठपुतली बनें।

इसमें एक नैरेटिव और खासकर झूठे नैरेटिव के तहत पर्दे के पीछे से भीड़तंत्र द्वारा लोगों को आक्रोशित करने का प्रयास किया जाता है, जिससे उस देश की सरकार पर दबाव बनाया जा सके। हाल में हुए बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, फ्रांस, अल्बानिया आदि देशों में हुए उग्र प्रदर्शनों को सूक्ष्मता से देखें तो इन प्रदर्शनों के पीछे अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप को नकारा नहीं जा सकता।

इस समय भारत की बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था, वैश्विक स्तर पर भारत की बनती ग्लोबल लीडर की छवि तथा भारत का बढ़ता वैश्विक प्रभाव स्वाभाविक रूप से कुछ शक्तियों को खटक रहा है। इस संदर्भ में विगत कुछ महीनों में भारत में हुए विरोध-प्रदर्शनों में विदेशी प्रभाव की आशंका को कैसे नकारा जा सकता है।

अमेरिकी अरबपति जार्ज सोरोस और उनसे संबंधित एजेंसियों का नाम विशेष रूप से पूर्व सोवियत देशों के ‘कलर रेवोल्यूशन’ कराने के पीछे कुख्यात रहा है, जिनमें बलपूर्वक रिजीम चेंज कर दिया गया या फिर सरकारों की संरचना ही बदल देने का प्रयास किया गया। सोरोस का मोदी विरोध किसी से छिपा नहीं रहा है।

उनकी संस्थाओं ने अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध करने से लेकर नागरिकता संशोधन कानून यानी सीसीए के विरोध में हुए प्रदर्शनों को समर्थन दिया था। सोरोस ने 2023 में सार्वजनिक रूप से कहा था कि भारत में ‘लोकतांत्रिक पुनरुत्थान’ की आवश्यकता है और आने वाले समय में इसका रास्ता खुल सकता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि कुछ विपक्षी नेता जिस रिजीम चेंज की रट लगा रहे हैं, उसके सूत्रधार सोरोस या उनके जैसे लोग ही हैं क्या? अमेरिकी मीडिया संस्थान फाक्स न्यूज की एक हालिया रिपोर्ट अतिवादी वामपंथी एवं समाजवादी समूह और कुछ इस्लामी संगठनों का एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क है, जिसे 'रेड-ग्रीन एलायंस' कहा जाता है।

101 संगठनों के इस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क ने 13 देशों में विरोध-प्रदर्शनों को बढ़ावा दिया है। रिपोर्ट बताती है कि वामपंथी, समाजवादी और इस्लामी संगठनों से जुड़े ये समूह विभिन्न देशों में प्रदर्शनों का आयोजन करने, उन्हें बढ़ावा देने और साझा संदेश फैलाने में भूमिका निभाते हैं।

इसमें ‘प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल’ जैसे संगठन का भी उल्लेख है, जिसके तार भारत, फ्रांस आदि में विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े हुए हैं। नेता-प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 2025 में प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात भी की थी। विपक्ष की मुहिम से जुड़े योगेंद्र यादव भी यह कह चुके हैं कि अब 'फैसला संसद में नहीं, सड़कों पर होगा।

' उद्धव शिवसेना गुट के नेता संजय राउत का कहना है कि देश में रिजीम चेंज होने वाला है। इस सबसे इसी आशंका को बल मिलता है कि विपक्ष लोकतंत्र का मार्ग छोड़कर अब अराजकता की राह पर अग्रसर होना चाह रहा है। विपक्षी दलों के अभियान से जुड़े एक प्रमुख चेहरे के रूप में उभरीं और अक्सर राहुल गांधी के साथ अग्रिम पंक्ति में नजर आने वालीं वामपंथी छात्र नेता नेहा बोरा ने कहा कि हमें क्रांति के लिए पड़ोसी बांग्लादेश से प्रेरणा मिली है।

क्या नेहा बोरा के साथ-साथ पूरा विपक्ष रिजीम चेंज का वही रास्ता अपनाना चाहता है, जैसा बांग्लादेश के कट्टरपंथियों ने अपनाया? नेहा कांग्रेस के धरना-प्रदर्शन में भी सक्रिय रहीं और सीजेपी के आंदोलन में भी। उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लाए गए जन महाभियोग में भी एक सांसद की तरह से बोलने का खास अवसर दिया गया।

रिजीम चेंज का प्रयास भारतीय लोकतंत्र की हत्या तो होगी ही, हमारे संविधान और संप्रभुता के लिए भी खतरा है। विपक्ष के नेता संविधान की प्रतियां तो लहराते रहते हैं और महात्मा गांधी तथा बाबा साहेब आंबेडकर के बताए रास्ते पर चलने का दम भरते हैं, लेकिन वे लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों के मार्ग पर चलना भूल से गए हैं।

अच्छी बात यही है कि विपक्ष का यह खतरनाक खेल जनता को समझ आने लगा है और शायद इसी कारण विपक्ष की रामलीला मैदान की रैली में कम भीड़ आई। (लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सीनियर प्रोफेसर हैं) संपादकीय आलेखnazariyaMon, 02 Nov 2026 09:35 PM (IST)जागरण संपादकीय: घुसपैठिए मतदाता।

समाचार स्रोत: DARSH NEWS

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