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विचार: सबक सिखाने वाले चुनाव

DARSH NEWS डेस्क • 03 Nov 2026, 09:53 PM IST
विचार: सबक सिखाने वाले चुनाव

सबसे दिलचस्प चुनाव परिणाम सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से आए। यहां 11 सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा छह, जबकि सपा पांच सीटें जीतने में सफल रही। चार राज्यों में 28 विधान परिषद सीटों के चुनाव परिणाम।

मतदाताओं ने सत्ताधारी दलों को दिया कड़ा संदेश। कांग्रेस, भाजपा, जदयू को अप्रत्याशित चुनौतियों का सामना। राज कुमार सिंह।

चार राज्यों में शिक्षक एवं स्नातक वर्ग की 28 विधान परिषद सीटों के चुनाव परिणाम फिर याद दिलाते हैं कि ‘व्यवस्था’ में ‘तंत्र’ भले ‘लोक’ पर हावी हो गया हो, मगर चुनाव में नेता नहीं, मतदाता ही ‘बलवान’ है। बैलेट पेपर से हुए इन चुनावों की तीन दिन तक चली मतगणना नेताओं को भी छकाती रही।

सबसे निराशाजनक परिणाम कांग्रेस के लिए रहे। कांग्रेस के पास इनमें से चार सीटें थीं, लेकिन अब मात्र एक रह गई। कांग्रेस शासित कर्नाटक में चार सीटों के लिए चुनाव हुए, पर वहां उसका खाता तक नहीं खुला।

हालांकि नुकसान उसे एक सीट का ही हुआ, क्योंकि इनमें से तीन सीटें पहले से ही भाजपा के पास थीं और एक कांग्रेस के, जो इस बार भाजपा के मित्र दल जेडीएस ने छीन ली। फिर भी यह तो सच है कि चार राज्यों की 28 सीटों के चुनाव में कांग्रेस एक सीट पर सिमट गई। भाजपा उसका मखौल उड़ाने से नहीं चूकी, पर कांग्रेस ने जो एकमात्र सीट जीती, वह नागपुर की है, जो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृह क्षेत्र है।

भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भी नागपुर ही है। नागपुर का परिणाम आने से पहले ही फडणवीस ने कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए एक्स पर पोस्ट करने का उतावलापन दिखाया, जिसे बाद में डिलीट करना पड़ा। देखा जाए तो चारों ही राज्यों में मतदाताओं ने सत्ता को सबक सिखाया है।

कर्नाटक में कांग्रेस की किरकिरी हुई तो महाराष्ट्र में भाजपा की अगुआई वाली महायुति की। ऐसे चुनावों में सत्तारूढ़ दल से हमेशा बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद रहती है, लेकिन कांग्रेस तो अपनी पिछली सीट भी हार गई। इसे मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और उनके पूर्ववर्ती सिद्धरमैया के बीच सब कुछ ठीक न होने का नतीजा माना जा रहा है।

दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच सहज संबंध आसान नहीं होते, लेकिन ऐसा करने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री शिवकुमार की ज्यादा है, जो कांग्रेस के संकटमोचक भी कहे जाते हैं। वैसे निराशाजनक प्रदर्शन के चलते असहज स्थिति कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए भी है, क्योंकि कर्नाटक उनका गृह राज्य है।

महाराष्ट्र में पांच सीटों के लिए हुए चुनाव में विपक्षी गठबंधन तीन जीत गया, जबकि सत्तारूढ़ महायुति को दो सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। यहां शिंदे-शिवसेना की महत्वाकांक्षाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं तो सुनेत्रा पवार की एनसीपी भी वित्त मंत्रालय वापस पाने के लिए दबाव बना रही है।

बुजुर्ग शरद पवार निश्चय ही अपने नियंत्रण वाली एनसीपी के प्रदर्शन से खुश होंगे। बिहार में भाजपा की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं। विधानसभा उपचुनाव में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की परंपरागत बांकीपुर विधानसभा सीट हारने के बाद भाजपा को पटना विधान परिषद सीट पर भी मिली मात से नवीन और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, दोनों के लिए असहज स्थितियां पैदा हो गई हैं।

जदयू में तो तकरार सड़क पर ही आ गई है। अधिकृत उम्मीदवार नीरज कुमार के विरुद्ध अनुज सिंह का समर्थन करने वाले बाहुबली विधायक अनंत सिंह को जदयू से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है, लेकिन रार यहीं पर थमने के आसार नहीं। जीतने के बाद नीरज ने जिस तरह केंद्रीय मंत्री ललन सिंह को लेकर सवाल उठाए, वह अंतर्कलह का ही संकेत रहा।

राजद और कांग्रेस में कलह भी इन चुनावों में सामने आ गई। सहमति न बन पाने पर दोनों अलग लड़े। राजद ने तो दो सीटें जीत कर अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन कांग्रेस पांच सीटों पर लड़ कर भी खाता नहीं खोल पाई।

कभी चुनाव रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव जीत के बाद इन चुनावों में भी एक सीट जीत कर सही राह पर होने का संकेत दिया है। अभी तक जनसुराज का उभार राजद के लिए ही खतरे की घंटी माना जा रहा था, लेकिन भाजपा को भी आत्मचिंतन करना पड़ेगा।

सबसे दिलचस्प चुनाव परिणाम सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से आए। यहां 11 सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा छह, जबकि सपा पांच सीटें जीतने में सफल रही। यह आंकड़ा भाजपा की बढ़त तो बताता है, लेकिन विधानसभा चुनाव से चार महीने पहले सपा का ऐसा प्रदर्शन सत्तारूढ़ दल के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

इसलिए भी कि सपा प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी की दोनों सीटें जीतने में सफल रही। सपा लखनऊ और आगरा की सीट भी जीत गई। इससे यह संकेत भी मिलता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद भाजपा जरूरी सुधारात्मक कदम नहीं उठा पाई है।

अगर कुछ कदम उठाए भी गए तो उनके वांछित परिणाम अभी तक सामने आते नहीं दिखते। उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री एवं सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर की यह टिप्पणी कि इन चुनावों में पढ़े-लिखे लोग वोट डालते हैं, इसलिए ज्यादा परेशान नहीं होना चाहिए, हमारी राजनीति के सोच को भी दर्शाती है।

बेशक विधान परिषद चुनाव में आम मतदाता वोट नहीं डालते, पर उनके बीच के ही पढ़े-लिखे लोग वोट डालते है, जिन्हें सामान्यत: भाजपा समर्थक भी माना जाता है। इसलिए ये चुनाव परिणाम सपा के लिए उत्साहवर्धक हैं। कांग्रेस ने भी सीटों के लिए दबाव न बनाकर समझदारी दिखाई।

भाजपा प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के संसदीय क्षेत्रों में हार गई तो मुख्यमंत्री के क्षेत्र में किसी तरह उसकी प्रतिष्ठा बची। चुनावों में भाजपा उम्मीदवारों के चयन पर भी सवाल कम नहीं उठ रहे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में योगी सरकार को भले ही ‘अंगद का पांव’ बताया हो, लेकिन लोकसभा चुनाव में ओबीसी-दलित छिटकते दिखे तो अब विधान परिषद चुनाव में टिकट वितरण में प्राथमिकता के बावजूद परंपरागत समर्थक सवर्ण भी दूर जाते दिखे।

जाहिर है, यूजीसी जैसे मुद्दों पर परंपरागत समर्थकों में भी नाराजगी दूर करते हुए भाजपा को अपने समीकरण दुरुस्त करने होंगे, क्योंकि विधानसभा चुनाव में कड़ा मुकाबला दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ दिख रहा है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं) संपादकीय आलेखnazariyaTue, 03 Nov 2026 09:53 PM (IST)विचार: सबक सिखाने वाले चुनाव।

समाचार स्रोत: DARSH NEWS

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