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'माफी दिल से मांगी है या सिर्फ कागज पर', CJI के खिलाफ टिप्पणी पर SC ने केरलम कांग्रेस से मांगा जवाब

DARSH NEWS डेस्क • 06 Nov 2026, 03:22 PM IST
'माफी दिल से मांगी है या सिर्फ कागज पर', CJI के खिलाफ टिप्पणी पर SC ने केरलम कांग्रेस से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने केरलम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पदाधिकारियों को CJI सूर्यकांत को निशाना बनाने वाली सोशल मीडिया पोस्ट पर अवमानना नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने केरलम कांग्रेस को भेजा नोटिस (फोटो-) सुप्रीम कोर्ट ने केरलम कांग्रेस को अवमानना नोटिस जारी किया।

CJI सूर्यकांत को निशाना बनाने वाली सोशल मीडिया पोस्ट का मामला। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान की सर्वोच्चता पर जोर दिया। डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली।

सुप्रीम कोर्ट ने आज शुक्रवार, 6 नवंबर को केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के पदाधिकारियों को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने उनसे जवाब मांगा है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को निशाना बनाकर सोशल मीडिया पर की गई एक पोस्ट के लिए उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ, वकील विनीत जिंदल द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की केरल इकाई @INCKerala के आधिकारिक X अकाउंट पर पोस्ट की गई सामग्री को लेकर स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्रवाई की मांग की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केरल कांग्रेस कमेटी के वकील ने कहा कि वह सामग्री पदाधिकारियों की मंजूरी के बिना अपलोड की गई थी, जिसे बाद में हटा दिया गया और बिना शर्त माफी भी मांग ली गई है। केरल कांग्रेस की माफी वाली बात पर न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने टिप्पणी की कि कोर्ट यह देखेगा कि 'यह माफी कलम से लिखी गई है या दिल से।

' बेंच ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा, 'संविधान की सर्वोच्चता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा, 'संविधान सर्वोच्च है, कोई भी व्यक्ति या राजनीतिक संगठन इससे ऊपर नहीं है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता कोई राजनीतिक सुविधा का विषय नहीं है।

' कोर्ट ने कहा, 'फैसलों की आलोचना की जा सकती है, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल डराने-धमकाने या न्याय प्रशासन में दखल देने के लिए एक ढाल के रूप में नहीं किया जा सकता। ' पीठ ने आगे कहा, 'कोर्ट का अधिकार कानून के शासन (rule of law) पर टिका है, न कि किसी राजनीतिक समर्थन पर।

इसे कमजोर करने की किसी भी कोशिश से सख्ती से निपटा जाना चाहिए। न्यायिक संयम (judicial restraint) को कभी भी संस्थागत कमजोरी नहीं समझना चाहिए। '।

समाचार स्रोत: DARSH NEWS

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