सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां। जस्टिस भुइयां ने मताधिकार, न्यायिक नियुक्तियों पर बेबाक राय रखी। कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता, न्यायपालिका में दखल पर सवाल उठाए।
धार्मिक भेदभाव, असहमति के अधिकार पर भी मुखरता से बात की। डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां इन दिनों अपने बेबाक बयानों के चलते देश भर में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं।
इसकी वजह है कि पिछले कुछ महीनों में अलग अलग कानूनी मंचों पर उन्होंने बेबाकी से अपना पक्ष रखा है। शैक्षणिक संस्थानों और स्मृति व्याख्यानों के दौरान जस्टिस भुइयां ने मतदान के अधिकार, न्यायिक नियुक्तियों, कॉलेजियम की कार्यप्रणाली, असहमति के अधिकार और संवैधानिक नैतिकता जैसे गंभीर मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी है।
उनके इन बयानों ने कानूनी जगत और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। बता दें कि 2 अगस्त 1964 को गुवाहाटी में जन्मे जस्टिस भुइयां का ताल्लुक एक वकालत से जुड़े परिवार से है। उनके पिता स्वर्गीय सुचेंद्र नाथ भुइयां असम के वरिष्ठ अधिवक्ता और महाधिवक्ता रह चुके हैं।
उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई गुवाहाटी से और कानून की डिग्री गुवाहाटी यूनिवर्सिटी व दिल्ली के किरोड़ी मल कॉलेज से पूरी की। 14 जुलाई 2023 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया गया था। वह 1 अगस्त 2029 को सेवानिवृत्त होंगे।
4 अक्टूबर को एनएएलएसएआर (NALSAR) में आयोजित एक मूट कोर्ट प्रतियोगिता में जस्टिस भुइयां ने कहा था कि लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित करना और उन्हें अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बनाना एक मनमाना कड़ा कदम है। कोई भी बहानेबाजी इसे सही नहीं ठहरा सकती।
31 अक्टूबर को मेघालय की यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के दीक्षांत समारोह में उन्होंने कहा था कि जो समाज सवाल पूछने से डरता है, वह तानाशाही के प्रति संवेदनशील और कमजोर हो जाता है। इसके साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर भी चिंता जताई थी।
पुणे के आईएलएस (ILS) लॉ कॉलेज में बोलते हुए उन्होंने कॉलेजियम प्रणाली पर खुलकर बात की थी। उन्होंने कहा था कि जब कॉलेजियम खुद यह दर्ज करता है कि केंद्र सरकार के अनुरोध पर किसी जज का ट्रांसफर किया जा रहा है, तो यह न्यायपालिका में सीधे दखल को साफ दिखाता है। इसके अलावा, पारदर्शिता की कमी पर बोलते हुए उन्होंने कहा था कि फैसलों के कारण न बताने से कई बार ऐसे लोग न्यायपालिका में आ जाते हैं जिनके विचार संविधान विरोधी होते हैं।
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