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विचार: प्रकाश की आकांक्षा का अनूठा उत्सव

DARSH NEWS डेस्क • 07 Nov 2026, 11:29 PM IST
विचार: प्रकाश की आकांक्षा का अनूठा उत्सव

दीपावली का आत्मीय अर्थ तब खुलता है, जब मनुष्य बाहरी जगमगाहट से हटकर अपने भीतर देखता है। दीपावली बाहरी चमक से परे आंतरिक प्रकाश की आकांक्षा है। उत्सव का सच्चा अर्थ घर के भीतर दृष्टि से शुरू होता है।

प्रकृति का सम्मान और मानवीय संबंध उत्सव का वास्तविक सार हैं। परिचय दास। संध्या उतरती है।

घरों की देहरियों पर दीप जलने लगते हैं। कहीं मिट्टी के छोटे दीयों में तेल की लौ कांपती है, कहीं रंगीन रोशनियां दीवारों पर अपना उत्सवी विस्तार रचती हैं। आकाश में आतिशबाजी के फूल खिलते हैं और कुछ क्षणों के लिए रात अपनी पहचान भूल जाती है।

दीपावली का यह दृश्य हर वर्ष लौटता है, फिर भी उसकी प्रतीक्षा पुरानी नहीं पड़ती। शायद मनुष्य के भीतर प्रकाश की एक ऐसी आकांक्षा है, जिसे समय की कोई ऋतु समाप्त नहीं कर सकती। वह बाहर दीप जलाता है, लेकिन भीतर एक प्रश्न जागता रहता है- क्या जीवन में सचमुच कुछ उजाला हुआ?

प्रकाश केवल अंधेरे का प्रतिपक्ष नहीं है। वह देखने की नई संभावना है। अंधेरे में वस्तुएं अपनी सीमाएं खो देती हैं, प्रकाश उन्हें पहचान लौटाता है।

दीपावली का आत्मीय अर्थ तब खुलता है, जब मनुष्य बाहरी जगमगाहट से हटकर अपने भीतर देखता है। उत्सव की असली शुरुआत घर के बाहर नहीं, दृष्टि के भीतर होती है। दीपावली की तैयारी घर की साफ-सफाई से आरंभ होती है, लेकिन धूल केवल वस्तुओं पर नहीं जमती।

समय की परतें मन पर भी उतरती हैं। प्रकाश पर्व पर घर सजाना अपने संसार को फिर से रचने जैसा है। कोई दरवाजे पर तोरण बांधता है, कोई चौखट पर रंगोली बनाता है, कोई मिट्टी के दीपों को अपने हाथों से रंगता है।

फूलों की पंखुड़ियां आंगन में बिखरती हैं, तो लगता है जैसे प्रकृति ने घर के लिए छोटा सा पत्र भेजा हो। रंगोली मिट जाती है, फूल मुरझा जाते हैं, दीप बुझ जाते हैं, फिर भी उनसे उपजी छटा का आनंद मन में बचा रहता है। सौंदर्य का एक रहस्य उसकी क्षणभंगुरता में छिपा है।

जो सदा नहीं रहता, वही कभी-कभी सबसे अधिक याद रह जाता है। एक छोटा-सा मिट्टी का दीया प्रकृति, श्रम और ऊर्जा का संसार समेटे रहता है। दीपक अंधेरे को पराजित करने की घोषणा नहीं करता।

वह बस अपने हिस्से का प्रकाश देता है। शायद मनुष्य के लिए इससे बड़ी शिक्षा कोई नहीं कि अपनी छोटी-सी सामर्थ्य को व्यर्थ न जाने दे। दीपावली के साथ बाजार का विस्तार होता है।

दुकानों की सजावट, नए वस्त्र, मिठाइयां और उपहार उत्सव को दृश्य वैभव देते हैं। बाजार इच्छाओं को पहचानता है और उन्हें नई वस्तुओं में बदलने की कला जानता है। वह बताता है कि किससे घर सुंदर होगा और कौन-सा उपहार संबंधों में मिठास बढ़ाएगा, पर वस्तु की चमक और जीवन की चमक एक नहीं होती।

कोई महंगी वस्तु किसी संबंध की रिक्तता नहीं भर सकती, लेकिन दीपावली पर उपहार देने की परंपरा संबंधों की सुंदर भाषा है। कभी एक पुस्तक, घर में बनी मिठाई या हाथ से लिखा संदेश किसी बड़े उपहार से अधिक आत्मीय हो जाता है। उपहार यह कहने का विनम्र तरीका है कि दूसरा व्यक्ति हमारी स्मृति में उपस्थित है।

समय ने परिवारों के रहने और मिलने के ढंग बदल दिए हैं। कई पीढ़ियां अब अलग-अलग नगरों और देशों में बसी हैं। डिजिटल माध्यमों ने दूरियों को छोटा किया है।

मोबाइल की स्क्रीन पर चेहरे दिखाई देते हैं, शुभकामनाएं आती हैं, तस्वीरें साझा होती हैं। तकनीक ने संपर्क सहज बनाया है, लेकिन निकटता का अर्थ केवल एक-दूसरे को देख लेना नहीं है। किसी के पास बैठना, उसकी चुप्पी सुनना और साथ समय बिताना मनुष्य की ऐसी जरूरतें हैं, जिन्हें कोई उपकरण पूरा नहीं कर सकता।

स्क्रीन चेहरा दिखा सकती है, उपस्थिति की ऊष्मा नहीं। उत्सव का सामाजिक अर्थ उन घरों की ओर देखने से खुलता है, जहां दीपावली की तैयारी सहज नहीं है। कहीं आर्थिक कठिनाई, कहीं बीमारी या अकेलापन है।

किसी दूसरे के अंधेरे से अनजान रहकर अपनी रोशनी पर गर्व करना प्रकाश का कमजोर अर्थ है। किसी घर तक एक दीप पहुंचा देना कभी-कभी हजारों दीप जलाने से अधिक अर्थवान हो जाता है। प्रकृति के साथ हमारा संबंध दीपावली के अर्थ को नया विस्तार देता है।

धुएं से भरी हवा और प्रदूषित परिवेश के बीच यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उत्सव का आनंद प्रकृति की कीमत पर क्यों हो? परंपरा जीवन के साथ चलती है और समय से संवाद करती है। मिट्टी के दीपों को अपनाना, स्थानीय कारीगरों से वस्तुएं खरीदना तथा अनावश्यक शोर और धुएं से बचना उत्सव की आभा को अधिक संवेदनशील बनाना है।

जिस धरती पर मनुष्य अपने उत्सव रचता है, उसकी सांसों का ध्यान रखना भी उत्सव की संस्कृति का हिस्सा है। दीपावली किसी के लिए घर लौटने की खुशी है, किसी के लिए बचपन की स्मृति, किसी के लिए धार्मिक आस्था और किसी के लिए नए आरंभ का संकेत। इन अलग-अलग अनुभूतियों के बीच एक साझा आकांक्षा है: जीवन में कुछ प्रकाशमय हो, संबंधों में सहजता लौटे और भविष्य के प्रति विश्वास बना रहे।

उत्सव की सुंदरता उसकी इसी बहुलता में है। एक ही दीप की लौ अलग-अलग आंखों में अलग अर्थ लेकर उतरती है। क्या दीवाली पर हमने किसी पुराने संबंध को फिर से छुआ?

किसी के श्रम को पहचाना? किसी अकेले व्यक्ति के लिए समय निकाला? दीपावली का स्थाई अर्थ शायद इसी बची हुई रोशनी में है।

दीपक का प्रकाश सीमित होता है, लेकिन उससे जन्मी दृष्टि असीम हो सकती है। प्रकाश का सबसे सुंदर रूप वह नहीं, जो आंखों को चकाचौंध कर दे, बल्कि वह है जिसमें मनुष्य दूसरे मनुष्य को देख-समझ सके। रोशनी के बीच मनुष्य की तलाश शायद इसी देखने की कला का नाम है।

(लेखक नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एवं डीन हैं) संपादकीय आलेखapnibaatSat, 07 Nov 2026 11:23 PM (IST)विचार: ट्रंप की हार से अच्छे दिनों की आस।

समाचार स्रोत: DARSH NEWS

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