शुक्रवार, 06 नवंबर 2026 12:16 AM IST
DARSH NEWS
🌤️ 18°C
विचार अखिल भारतीय 15,628 व्यूज

विचार: और अधिक अस्थिर हो सकता है विश्व

DARSH NEWS डेस्क • 05 Nov 2026, 11:30 PM IST
विचार: और अधिक अस्थिर हो सकता है विश्व

आज छल-बल से दूसरों पर हावी होने की मनोवृत्ति कई राष्ट्रों के कार्यकलापों में स्पष्ट देखी जा सकती है। ट्रंप का अहंकारपूर्ण रवैया वैश्विक अस्थिरता का कारण बन रहा है। अमेरिका के दोहरे मापदंड अंतरराष्ट्रीय संबंधों को कमजोर कर रहे हैं।

भारत वैश्विक शांति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। जगमोहन सिंह राजपूत। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अहंकार के उस स्तर तक पहुंच गए दिख रहे हैं, जहां नैतिकता, पारस्परिकता, व्यवहार में समानता और आदर जैसे मानवीय मूल्य बेमानी हो जाते हैं।

इसका ताजा प्रमाण यह है कि मध्यावधि चुनावों में हार के बाद भी उनके रवैये में बदलाव आने के आसार नहीं। यदि उनका रवैया बदलता नहीं तो विश्व और अधिक अस्थिर हो सकता है। ध्यान रहे कि अमेरिका और उसकी अगुवाई वाला सैन्य संगठन नाटो यूक्रेन-रूस युद्ध में हर प्रकार से यूक्रेन की सहायता कर रहा है।

यूरोप रूस से गैस खरीद रहा है। ट्रंप को इससे न पहले कोई एतराज था, न अब है, लेकिन भारत के रूस से तेल खरीदने पर ट्रंप इतने रूठ गए कि अनेक प्रकार के दंडात्मक प्रतिबंध लगाने की धमकी देने लगे। उन्होंने भारत को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

होर्मुज जलमार्ग में यातायात बाधित होने से कई देश ऊर्जा के मामले में गंभीर आर्थिक तंगी के शिकार हो रहे हैं और वैकल्पिक व्यवस्थाएं तलाश रहे हैं, लेकिन अमेरिका को इसकी कोई चिंता नहीं। अब तो यह दोमुंही राजनीति इस स्तर पर पहुंच गई है कि ट्रंप स्वयं रूस से डीजल खरीद रहे हैं।

भारत खरीदे तो उस पर रूस को युद्ध में हथियार खरीदने में मदद करने का आरोप लगाया जाता है, लेकिन ट्रंप खुद खरीदें तो वह पूरी तरह सही। वैश्विक राजनीति का यह कैसा चेहरा उभरकर सामने आया है? अमेरिका अपने आपको सबसे पुराना लोकतंत्र कहता है।

वह अपने को श्रेष्ठतम राष्ट्र मानकर ही संतुष्ट नहीं, बल्कि एक निरंकुश वैश्विक जमींदार जैसा बनने की जुगत में लगा रहता है। ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिकी प्रशासन का अहंकार कुछ ज्यादा ही बढ़ा है। इस साल जनवरी में राष्ट्रपति ट्रंप के आदेश पर वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को उनके घर में घुसकर उठा लिया गया और दोनों को अमेरिका की एक जेल में डाल दिया गया।

आश्चर्य है कि किसी देश या देशों के समूह ने वैश्विक नियमों का नग्न उल्लंघन करने वाली इस घटना की खुलकर निंदा तक नहीं की। संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह शांत रहा। सुरक्षा परिषद ने भी कोई वक्तव्य तक देने का साहस नहीं किया, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि अमेरिका ने किसी देश के साथ ऐसी मनमानी और दादागीरी दिखाई हो।

ट्रंप के कारण ईरान में जो कुछ हो रहा है, उसके दुष्परिणाम पूरे विश्व को झेलने पड़ रहे हैं। अमेरिका इसी प्रकार के अनैतिक आक्रमण वियतनाम, इराक, लीबिया जैसे देशों में कर चुका है। इन सभी देशों में अमेरिका को हर बार मुंह की खानी पड़ी, मगर उसकी अहंकारवादी नीतियों में कोई अंतर नहीं आया।

कई देशों में सरकारें गिराने और बनाने में उसके संलग्न रहने की खबरें आती रही हैं। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में जो उथल-पुथल हुई, उसमें अमेरिका का हाथ होने का आरोप लगा। आज छल-बल के जरिये दूसरों से श्रेष्ठ बनने की मनोवृत्ति राष्ट्रों के बीच संबंधों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कार्यकलापों तक में देखी जा सकती है।

शांति की स्थापना कैसे की जा सकती है, यह सभी जानते हैं, लेकिन राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर सभी को सम्मान दे पाने में सक्षम नेतृत्व शीर्ष स्तर पर कभी-कभी ही पहुंच पाता है। महात्मा गांधी, नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग और हो ची मिन्ह जैसे लोग विश्व को एक परिवार मानने की अवधारणा को व्यावहारिक स्वरूप देने में सक्षम थे।

समय के साथ उनके सिद्धांतों और जीवन-मूल्यों को भुलाने में सत्ता में आए लोग अधिक रुचि लेते दिखते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप वैश्विक स्तर पर जो कुछ कर रहे हैं, वह हर देश के सतर्क एवं जागरूक नागरिक के मन में आक्रोश पैदा कर रहा है। अमेरिका का तथाकथित बड़प्पन अपने मनमाने स्वरूप में विश्व के समक्ष अनेक बार आ चुका है।

अमेरिका जो कुछ करता है या पाकिस्तान जैसे देशों से कराता है, वह अब विश्व के अनेक देशों की आंखें खोल रहा है। वैश्विक बेचैनी बढ़ रही है। मध्यावधि चुनाव में हार के बाद लोग इस उम्मीद में हैं कि अब शायद ट्रंप का रवैया बदले, क्योंकि अमेरिका के तमाम नागरिकों के लिए भी अपने राष्ट्रपति के कार्यकलापों को उचित ठहराना कठिन हो गया था और शायद इसीलिए उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी का पक्ष लिया।

इस समय कुछ तथाकथित विकसित देश युद्ध की तैयारी के लिए शोध और नए-नए संहारक हथियार बनाने पर स्वास्थ्य और शिक्षा से भी अधिक धन खर्च कर रहे हैं। पारस्परिक अविश्वास लगातार बढ़ रहा है। संभावित समाधान के लिए कई देश भारत की ओर देख रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में मैंने विदेश में आयोजित होने वाले विभिन्न सम्मेलनों में भारत की लगातार बढ़ रही साख को देखा है। ऐसे हर अवसर पर मुझे प्रसिद्ध विचारक और इतिहासकार डा. अर्नोल्ड टायनबी का बहुचर्चित उद्धरण याद आता है, 'यह भलीभांति स्पष्ट हो रहा है कि एक अध्याय, जिसकी शुरुआत पाश्चात्य थी, यदि उसका अंत मानवजाति के आत्मसंहार में नहीं होना है तो समापन भारतीय होगा।

' भारत के पास एक ऐसी मनोवृत्ति एवं भावना है, जो मानवजाति को एक परिवार के रूप में विकसित होने में सहायक हो सकती है। भारत के लिए अपने ऐतिहासिक उत्तरदायित्व के निर्वाह करने का यही सही समय है। (लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं) संपादकीय आलेखapnibaatThu, 05 Nov 2026 11:30 PM (IST)विचार: और अधिक अस्थिर हो सकता है विश्व।

समाचार स्रोत: DARSH NEWS

पाठक प्रतिक्रियाएं

इस श्रेणी की अन्य ख़बरें

होम
राजनीति
खेल
सिनेमा
वायरल