बॉलीवुड को हजारों सुरीले गानों से सजाने वाले लक्ष्मीकांत (Laxmikant) के संगीत ने कभी लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) को मंत्रमुग्ध कर दिया था। लता मंगेशकर ने पहचाना था लक्ष्मीकांत का हुनर। फोटो क्रेडिट- एक्स संगीत के अलावा लक्ष्मीकांत ने फिल्मों में की एक्टिंग लक्ष्मीकांत का संगीत सुन हैरान थीं लता मंगेशकर प्यारेलाल संग चार दशक तक सिनेमा में किया राज एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली।
अपने संगीत के दम पर फर्श से अर्श तक पहुंचने वाले दिग्गज संगीतकार लक्ष्मीकांत शांताराम कुदलकर (Laxmikant Shantaram Kudalkar) आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। 3 नवंबर 1937 को दीपावली के दिन उनका जन्म हुआ था और इसीलिए परिवार ने उनका नाम लक्ष्मीकांत रख दिया था। लक्ष्मीकांत बहुत छोटे थे, जब उनके पिता का निधन हो गया था।
पिता के निधन के बाद अचानक परिवार की आर्थिक हालत खराब हो गई थी। पिता के एक संगीतकार दोस्त थे जिन्होंने लक्ष्मीकांत और उनके बड़े भाई को सलाह दी कि वे संगीत सीख लें ताकि आगे चलकर वह अपने हुनर के दम पर नाम और पैसा कमा सके। लक्ष्मीकांत और उनके बड़े भाई ने संगीत सीखना शुरू किया।
उनके भाई ने तबला बजाना सीखा और लक्ष्मीकांत मैंडोलिन का गुण सीखने लगे। उन्होंने मशहूर मैंडोलिन वादक हुसैन अली के साथ दो साल बिताए। उन्होंने कार्यक्रमों में भी मैंडोलिन बजाना शुरू कर दिया।
एक रोज कोलाबा के रेडियो क्लब में 11 साल के लक्ष्मीकांत मैंडोलिन बजा रहे थे। इतनी सी उम्र में उन्हें मैंडोलिन बजाता हुआ देख उनकी धुनों में लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) खो गईं। उन्हें लक्ष्मीकांत का म्यूजिक इतना पसंद आया कि उन्होंने उस दौर के दिग्गज म्यूजिक डायरेक्टर्स शंकर-जयकिशन, एसडी बर्मन (SD Burman) और नौशाद से उनकी सिफारिश की।
म्यूजिक इवेंट्स में परफॉर्म करने के साथ-साथ लक्ष्मीकांत ने अभिनय में भी हाथ आजमाया। वह 1949 में फिल्म भक्त पुंडलिक और 1950 में आंखें में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम किया। वह कई गुजराती फिल्मों का हिस्सा भी बने।
हालांकि, संगीत की दुनिया ने उन्हें असली पहचान तब दिलाई, जब वह प्यारेलाल से मिले। प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा (Pyarelal Ramprasad Sharma) भी लक्ष्मीकांत की तरह एक स्ट्रंगलिंग कंपोजर थे। दोनों की मुलाकात बॉम्बे के रंजीत स्टूडियो में हुई थी और वे दोस्त बन गए थे।
कहा जाता है कि जब प्यारेलाल म्यूजिक इंडस्ट्री छोड़कर विदेश में बसने का मन बना रहे थे, तब लक्ष्मीकांत ने उन्हें साथ में म्यूजिक बनाने का सुझाव दिया था। फिर क्या! 1963 में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने मिलकर संगीत की दुनिया में कदम रखा। उनकी पहली फिल्म 'पारसमणि' थी जिसने दोनों को रातोंरात स्टार बना दिया था।
फिल्म के दोनों गाने 'हंसता हुआ नूरानी चेहरा' और 'वो जब याद आए' दोनों ही चार्टबस्टर बन गए। यहीं से उनकी किस्मत का ताला खुला। ।
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