अमेरिकी मिडटर्म चुनाव 2026 में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने संसद के दोनों सदनों (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट) पर अपना कब्जा जमा लिया है। इस करारी शिकस्त के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ गए हैं। हालांकि वे जनवरी 2029 तक राष्ट्रपति पद पर बने रहेंगे, लेकिन अब संसद में बहुमत न होने से उनके लिए मनमाने फैसले लेना मुमकिन नहीं होगा।
डोनाल्ड ट्रंप के लिए आए इस बड़े राजनीतिक झटके के भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के लिए अलग-अलग सियासी और आर्थिक मायने हैं। एक तरफ जहां भारत के लिए ट्रेड और वीजा मोर्चे पर राहत मिलने के आसार हैं, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों और ट्रंप के परिवार के बीच हुए कारोबारी सौदे जांच के घेरे में आ सकते हैं।
ट्रंप जनवरी 2029 तक राष्ट्रपति पद पर बने रहेंगे, लेकिन अब उनके सामने कांग्रेस में मजबूत विपक्ष होगा। वह अपनी मर्जी से हर कानून पास नहीं करा पाएंगे। डेमोक्रेट्स ने ट्रंप की विदेश नीति और उनके परिवार के कारोबारी हितों की जांच के संकेत भी दिए हैं।
ऐसे में सवाल है कि बदले हुए अमेरिकी राजनीतिक समीकरण का भारत और पाकिस्तान को क्या फायदा या नुकसान हो सकता है? ट्रंप की चुनावी हार के बाद भारत के साथ व्यापार समझौता उनके एजेंडे में ऊपर आ सकता है। रिपब्लिकन पार्टी को लगे झटके के बाद ट्रंप अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के लिए किसी बड़ी विदेश नीति की कामयाबी चाहते होंगे।
भारत के साथ जल्दी ट्रेड डील करना ऐसा ही एक रास्ता हो सकता है। लेकिन भारत इस बार जल्दबाजी में समझौता करने के मूड में नहीं दिख रहा। वह चाहता है कि उसे चीन और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले बेहतर टैरिफ शर्तें मिलें।
इसी वजह से कई महीनों से बातचीत अटकी हुई है। इसके अलावा अमेरिकी प्रशासन ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत भारत समेत कई देशों की जांच कर रहा है। जांच का मुद्दा यह है कि क्या ये देश जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता का इस्तेमाल करके अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
इस जांच ने भी व्यापार समझौते की राह मुश्किल बनाई है। कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की ताकत बढ़ने से भारतीय कारों को कुछ राहत मिल सकती है। भारत पर प्रतिकूल शर्तों वाला समझौता जल्द स्वीकार करने का दबाव कम हो सकता है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि भारत-अमेरिका रिश्तों में तनाव खत्म हो जाएगा। ट्रंप के पास राष्ट्रपति के तौर पर अपने कार्यकारी अधिकारों का इस्तेमाल करके टैरिफ लगाने की ताकत बनी रहेगी। डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली कांग्रेस उनके फैसलों को अपने आप रद्द नहीं कर सकती।
लेकिन सांसद यह जांच कर सकते हैं कि टैरिफ से अमेरिकी कंपनियों और आम उपभोक्ताओं को कितना नुकसान हो रहा है। इससे प्रशासन पर अपनी नीति बदलने का दबाव बन सकता है। ।
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