सिर्फ माता-पिता के वेतन या आय से तय नहीं होगी क्रीमी लेयर : सुप्रीम कोर्ट 11 मार्च, 2026 का फैसला दोहराया; आगे की तिथि से लागू करने की केंद्र की मांग ठुकराई फैसला लागू करने के लिए केंद्र सरकार को दिया दो और माह का समय केंद्र की दलील थी, कोर्ट को फैसला आगे की तिथि से लागू करने का अधिकार ।
सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) या निजी क्षेत्र में कार्यरत माता-पिता का वेतन या आय अपने आप में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के अभ्यर्थियों को क्रीमी लेयर के आधार पर आरक्षण से बाहर करने का मानक नहीं हो सकता। माता-पिता के पद की स्थिति और श्रेणी की कसौटी पर भी इसे कसा जाना चाहिए।
इस तरह शीर्ष अदालत ने अपने 11 मार्च के फैसले को बरकरार रखा है। गौरतलब है कि सरकार ने 11 मार्च, 2026 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट से आगे की तिथि लागू करने का अनुरोध किया था। केंद्र ने याचिका में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत इस अदालत को फैसले को आगे की तिथि से लागू घोषित करने का अधिकार है।
अगर ऐसा नहीं किया गया, तो यह उन कर्मचारियों के लिए अन्यायपूर्ण होगा, जो मुकदमे में पक्षकार तक नहीं थे। इससे प्रशासनिक अव्यवस्था भी पैदा हो सकती है। इसलिए 11 मार्च के फैसले को केवल आगे की तिथि से लागू किया जाए, ताकि पहले पूरी हो चुकी भर्ती प्रक्रियाएं प्रभावित न हों।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने फैसला आगे की तिथि से लागू करने की केंद्र की मांग खारिज करते हुए कहा कि इसके क्रियान्वयन को टालने का कोई ठोस आधार नहीं है। पीठ ने कहा, '11 मार्च, 2026 का फैसला इस अदालत के समक्ष आए पक्षकारों के अधिकार निर्धारित करता है।
इसमें कहा गया है कि प्रतिवादी अभ्यर्थी ओबीसी की गैर-क्रीमी लेयर श्रेणी में आते हैं और वे आरक्षण के लाभ के साथ-साथ उन चयन प्रक्रियाओं में पदस्थापन और पद आवंटन के हकदार हैं, जिनमें उन्होंने भाग लिया था। उन्हें इस लाभ को देने से अपने आप में किसी अन्य व्यक्ति की वरिष्ठता प्रभावित नहीं होगी और न ही पहले ही पूरी हो चुकी चयन प्रक्रिया या नियुक्तियों को फिर से खोलने की जरूरत होगी।
इस संबंध में यह उल्लेख करना उचित होगा कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने 20 दिसंबर, 2016 के अपने पत्र में स्पष्ट किया था कि सिविल सेवा परीक्षा, 2016 के तहत चयन इस अदालत में लंबित अपीलों के फैसले के आधार पर होगा। ' शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि फैसला अदालत के समक्ष आए पक्षकारों पर ही लागू होगा और पहले से प्रदान की जा चुकी वरिष्ठता तथा पदोन्नतियों पर दोबारा विचार नहीं किया जाएगा।
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