पटना: बिहार में अंतरिक्ष विज्ञान, रिमोट सेंसिंग और आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से जल प्रबंधन, कृषि और आपदा नियंत्रण को नई दिशा देने की तैयारी की जा रही है। इसके तहत राज्य में विकसित किए जा रहे वॉटर रिसोर्स इन्फॉर्मेशन सिस्टम से प्रशासन के साथ-साथ आम लोगों और किसानों को भी लाभ मिलने की उम्मीद है।
इस प्लेटफॉर्म के जरिए पानी की उपलब्धता की रियल टाइम जानकारी मिलेगी, जिससे सिंचाई, कृषि और पेयजल से जुड़ी योजनाओं को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। इस दिशा में आयोजित स्पेस एप्लीकेशन एडॉप्शन वर्कशॉप में अंतरिक्ष आधारित तकनीकों और नवाचारों के जरिए कृषि, शिक्षा और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाओं पर चर्चा की गई।
वर्कशॉप में शामिल वस्सारलैब्स के प्रोजेक्ट मैनेजर डॉ. गौरी शंकर भूनिया ने बताया कि उनकी संस्था जल संसाधन, एक्वाकल्चर, आपदा प्रबंधन और स्मार्ट सिटी समाधानों के क्षेत्र में काम करती है। जल प्रबंधन के क्षेत्र में संस्था एंड-टू-एंड समाधान उपलब्ध कराती है।
उन्होंने बताया कि इसके तहत किसी राज्य में जल की कुल उपलब्धता, भूजल और सतही जल की स्थिति से जुड़ी जानकारी जुटाई जाती है। इसके अलावा सतही जल के बेहतर प्रबंधन और उपलब्ध संसाधनों के प्रभावी इस्तेमाल के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी मजबूत किया जाता है। डॉ.
भूनिया के मुताबिक, बिहार में विकसित किया जा रहा वॉटर रिसोर्स इन्फॉर्मेशन सिस्टम एक सराहनीय पहल है। यह प्लेटफॉर्म राज्य के प्रशासन और आम लोगों को जल संसाधनों की उपलब्धता समझने तथा उनका बेहतर इस्तेमाल करने में मदद करेगा। इस सिस्टम के माध्यम से अधिकारियों को रियल टाइम में पानी की उपलब्धता की जानकारी मिल सकेगी।
इससे कृषि, सिंचाई और पेयजल से संबंधित योजनाएं तैयार करने और उनके बेहतर क्रियान्वयन में सहायता मिलेगी। इस तकनीकी प्लेटफॉर्म का फायदा किसानों को भी मिलेगा। उन्हें अपने क्षेत्र में जल की उपलब्धता और उसकी स्थिति की जानकारी मिल सकेगी।
इससे किसान जरूरत के मुताबिक पानी का इस्तेमाल कर पाएंगे और जल की बर्बादी रोकने में मदद मिलेगी। डॉ. भूनिया ने इस पहल में काम करने और भागीदारी का अवसर देने के लिए बिहार सरकार और मुख्यमंत्री के प्रति आभार जताया।
बिहार में हर साल आने वाली बाढ़, खासकर उत्तर बिहार की बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए भी राज्य सरकार ने वैज्ञानिक अध्ययन की पहल की है। इसके तहत गंगा की तीन प्रमुख सहायक नदियों—कोसी, गंडक और सोन में जमा होने वाली गाद, उनके बाढ़ क्षेत्र और अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं का विस्तृत अध्ययन कराया जाएगा।
इस अध्ययन के लिए रुड़की स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (NIH) और बिहार के जल संसाधन विभाग के बीच जल्द ही विशेष समझौता होने जा रहा है। राज्य सरकार ने इस परियोजना के लिए 1 करोड़ 99 लाख 42 हजार रुपये के बजट का प्रावधान किया है। इस पहल से नदियों में गाद की स्थिति और बाढ़ से जुड़े कारणों को वैज्ञानिक तरीके से समझने में मदद मिलने की उम्मीद है।
अंतरिक्ष आधारित तकनीक, रिमोट सेंसिंग और जल संसाधन से जुड़े आंकड़ों का बेहतर इस्तेमाल बिहार में जल प्रबंधन, किसानों की जरूरतों और आपदा नियंत्रण के प्रयासों को मजबूत कर सकता है। ।
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