इजरायल की राजनीति में बड़ा उलटफेर होता दिख रहा है। करीब 19 साल से अलग-अलग कार्यकाल में सत्ता संभाल रहे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने इस बार कुर्सी बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है। 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव में उनकी अगुवाई वाला गठबंधन सबसे बड़ा गुट बनकर उभरा, लेकिन बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाया।
दूसरी तरफ, उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट ने भी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं किया। अब इजरायल के राष्ट्रपति आइजक हरजोग ने आइसेनकोट को सरकार बनाने का मौका देने का फैसला किया है। शनिवार को राष्ट्रपति ने इसकी घोषणा की।
उन्हें औपचारिक रूप से सरकार बनाने का न्योता रविवार को दिया जाना है। यह नेतन्याहू के लिए बड़ा राजनीतिक झटका है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इजरायल में नई सरकार बन चुकी है या नेतन्याहू तत्काल पद छोड़ रहे हैं।
आइसेनकोट को अब अलग-अलग दलों को साथ लाकर संसद में बहुमत साबित करना होगा। राष्ट्रपति ने आइसेनकोट को ही क्यों चुना? इजरायल में राष्ट्रपति का काम सिर्फ चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें पाने वाले दल के नेता को सरकार बनाने के लिए बुलाना नहीं है।
उन्हें संसद के सभी राजनीतिक गुटों से बातचीत करनी होती है। इसके बाद यह देखना होता है कि किस उम्मीदवार के पास सरकार बनाने और संसद का भरोसा हासिल करने की बेहतर संभावना है। राष्ट्रपति आइजक हरजोग ने 4 और 5 नवंबर को अलग-अलग दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत की थी।
इस दौरान 67 सांसदों के प्रतिनिधित्व वाले गुटों ने गादी आइसेनकोट के नाम की सिफारिश की। वहीं, 46 सांसदों के प्रतिनिधित्व वाले गुटों ने नेतन्याहू को सरकार बनाने का मौका देने की बात कही। सात सांसदों वाले एक गुट ने किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में सिफारिश नहीं की।
राष्ट्रपति ने 5 नवंबर को कहा था कि उन्हें दोनों खेमों के बीच आपसी विरोध और मतभेदों को देखते हुए यह तय करना था कि कौन स्थिर सरकार बना सकता है। इसके लिए वह पार्टी नेताओं से सीधे बातचीत करेंगे। आखिरकार उन्होंने आइसेनकोट को आगे बढ़ाने का फैसला किया।
इजराइल में नेतन्याहू की कुर्सी फंसी,अमेरिका में ट्रंप का इम्तिहान! क्या चुनाव बाद ईरान पर फिर बरसेंगे बम? 120 सीटों वाली संसद में किसके पास कितनी ताकत? इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है।
इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। किसी भी सरकार को विश्वास मत हासिल करने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए। 27 अक्टूबर के चुनाव में किसी भी गठबंधन को यह आंकड़ा नहीं मिला।
आधिकारिक चुनावी नतीजों के मुताबिक, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 27 सीटें मिलीं। आइसेनकोट की याशर पार्टी 21 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही। गठबंधन के स्तर पर तस्वीर कुछ इस तरह बनी इस तरह नेतन्याहू का गठबंधन सबसे बड़ा गुट होने के बावजूद बहुमत से आठ सीट दूर रह गया।
आइसेनकोट के गठबंधन को बहुमत के लिए 13 और सांसदों की जरूरत है। अरब पार्टियों के पास कुल 19 सीटें हैं। ऐसे में सरकार गठन की पूरी लड़ाई इन्हीं सांसदों के समर्थन और गठबंधन की शर्तों के इर्द-गिर्द घूम रही है।
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