भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा में कुछ ऐसे ग्रंथ हैं, जिनकी प्रासंगिकता समय और सीमाओं से परे है। तमिल भाषा का महान काव्य ग्रंथ तिरुक्कुरल भी ऐसी ही अमूल्य धरोहर है, जो मानव जीवन के नैतिक, सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक पहलुओं को सरल शब्दों में गहन संदेश देता है। काशी तमिल संगमम 5.
0 की थीम 'Thirukkural Payilvom' अर्थात 'तिरुक्कुरल पढ़ें और सीखें' इसी शाश्वत ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास है। 28 नवंबर से 12 दिसंबर 2026 तक आयोजित होने वाला काशी तमिल संगमम का पांचवां संस्करण काशी और तमिलनाडु के सदियों पुराने सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत संबंधों को और मजबूत करेगा।
इस बार तिरुक्कुरल को केंद्र में रखकर भारतीय भाषाओं, साहित्य और ज्ञान परंपराओं के बीच संवाद को नई दिशा देने की पहल की गई है। क्या है तिरुक्कुरल? तिरुक्कुरल तमिल साहित्य की एक महान नैतिक काव्य रचना है, जिसके रचयिता संत तिरुवल्लुवर माने जाते हैं।
इसमें 1,330 दोहे हैं, जिन्हें 'कुरल' कहा जाता है। प्रत्येक कुरल अत्यंत संक्षिप्त होते हुए भी जीवन के गहरे अनुभवों और मूल्यों को अभिव्यक्त करता है। इस ग्रंथ को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है-अरम (धर्म एवं सदाचार), पोरुल (अर्थ, शासन एवं सामाजिक जीवन) और इनबम (प्रेम एवं पारिवारिक जीवन)।
इन तीनों के माध्यम से तिरुक्कुरल व्यक्ति, समाज और शासन के आदर्शों का व्यापक दर्शन प्रस्तुत करता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी सार्वभौमिकता है। यह किसी एक धर्म, जाति या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्य, अहिंसा, करुणा, आत्मसंयम, कृतज्ञता, न्याय, परोपकार और मानवीय गरिमा जैसे मूल्यों को सभी के लिए प्रासंगिक बनाता है।
तिरुक्कुरल केवल उपदेशों का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन जीने की व्यावहारिक कला भी है। इसमें व्यक्ति के चरित्र निर्माण से लेकर परिवार, मित्रता, प्रेम, शिक्षा, कृषि, आर्थिक व्यवस्था और सुशासन तक के विषयों पर विचार किया गया है। यह सत्य बोलने, क्रोध पर नियंत्रण रखने, दूसरों के प्रति दया रखने और जरूरतमंदों की सहायता करने की प्रेरणा देता है।
साथ ही, एक आदर्श शासक के गुण, न्यायपूर्ण शासन, योग्य मंत्रियों, जनकल्याण, युद्ध और शांति जैसे राजनीतिक विषयों पर भी मार्गदर्शन करता है। तिरुक्कुरल का मूल संदेश है कि मनुष्य की महानता उसके पद, संपत्ति या शक्ति से नहीं, बल्कि उसके आचरण और नैतिक मूल्यों से निर्धारित होती है।
काशी तमिल संगमम की मूल भावना भारत की विविध भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच आत्मीय संबंधों को पुनर्जीवित करना है। काशी और तमिलनाडु के बीच आध्यात्मिक, साहित्यिक और शैक्षिक संबंध सदियों पुराने हैं। तिरुक्कुरल को इस आयोजन की थीम बनाना उत्तर और दक्षिण भारत की साझा ज्ञान परंपरा को समझने का अवसर प्रदान करता है।
आज जब समाज अनेक प्रकार की चुनौतियों से गुजर रहा है, तब तिरुक्कुरल के विचार और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। नैतिकता, सामाजिक सद्भाव, जिम्मेदार शासन, पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और मानवीय व्यवहार जैसे विषय आधुनिक जीवन की भी आवश्यकताएं हैं। ।
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